Sunday, February 14, 2010

मन, तूने क्या पाया था?


मन, तूने क्या पाया था?

नियति नहीं खेलती
मृग-तृष्णा का खेल.
नित्य यहाँ होता है
विरह और मेल.
फिर भ्रमितों की भांति
तू क्यूँ भरमाया था?
मन, तूने क्या पाया था?

अज्ञान का तिमिर भी
है समय का बंधक.
मंथन के प्रकाश में
हो जाता है पृथक.
व्यर्थ की मादकता में
तू क्यूँ डगमगाया था?
मन, तूने क्या पाया था?


त्रिवेणी सा नहीं होता
हर घाट यहाँ पर.
श्वेत-श्यामला जहाँ
मिल जाएँ उमड़ कर.
बहती धारा का क्षोभ
तूने क्यूँ मनाया था?
मन, तूने क्या पाया था?

सत्कर्मों का हर साधी,
आराध्य नहीं होता है.
और विनीत है वो सदैव
बाध्य नहीं होता है.
जीवन के उपवन में क्या
पारिजात खिल आया था?
मन, तूने क्या पाया था?

Picture Courtesy: http://vwoopvwoop.wordpress.com/2011/12/01/respecting-other-peoples-grief/

7 comments:

  1. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
    कलम के पुजारी अगर सो गये तो
    ये धन के पुजारी
    वतन बेंच देगें।



    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

    ReplyDelete
  2. राजा, मंत्री, चोर, सिपाही, न्याय खेल में न्यारा होता,
    किस्सों के बुझौवल में कितना सत्य शुद्ध बंटवारा होता,
    अब तो पुस्तक से अनुसंशित, विधिक न्याय अभियुक्त प्रसंशित,
    दांव पेंच में सहस गंवाते, खोटी कौड़ी पाने को !!४॥ ....

    bahut sunder likha hai, badhaai.

    ReplyDelete
  3. बहती धारा का क्षोभ
    तूने क्यूँ मनाया था?
    मन, तूने क्या पाया था?
    वाह!

    ReplyDelete

  4. दिनांक 23/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  5. नियति नहीं खेलती
    मृग-तृष्णा का खेल.
    नित्य यहाँ होता है
    विरह और मेल.
    फिर भ्रमितों की भांति
    तू क्यूँ भरमाया था?
    मन, तूने क्या पाया था?

    Bahut khoob...bahut sundar

    ReplyDelete
  6. यशवंत भाई की हलचल यहाँ खींच लायी. ऐसे अच्छे भाव गहन आतंरिक अन्वेषण से आ पाते हैं और फिर आपने इसे इतने सुन्दर शब्दों में पिरोकर बिलकुल अविस्मरणीय बना दिया. इस सुन्दर कृति की बधाई मधुरेश भाई.

    निहार

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर मधुरेश्जी ....बहुत ही सुन्दर ...!

    ReplyDelete