Wednesday, February 27, 2013

अब रात कहाँ आती है यहाँ!



इक दौर मुक़म्मल होता था
सच-झूठ का, जीत-हार का,
इक दौर था जीने-मरने का,
इक दौर था नफरत-प्यार का.
अब तो जीते जो हारा है,
सच से अब झूठ ही प्यारा है,
कि कई नावों में पैर यहाँ,
ढूंढे अब कौन किनारा है!
कोई बूझ के भी अनबुझ सा है,
कि फेक है क्या सचमुच सा है,
होते थे कभी दिन-रात यहाँ,
अब तम-प्रकाश का फर्क कहाँ?
दिन के घनघोर उजाले में
अंतस में तम घर करता है,
अब रात कहाँ आती है यहाँ,
सबकुछ बेदार चमकता है!

45 comments:

  1. अब तो जीते जो हारा है,
    सच से अब झूठ ही प्यारा है,
    कि कई नावों में पैर यहाँ,
    ढूंढे अब कौन किनारा है!

    बेहतरीन पंक्तियाँ....

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    1. शुक्रिया मोनिका दीदी :)
      आपका नियमित ब्लॉग पर आना और उत्साहवर्धन करना बहुत अच्छा लगता है।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  2. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ...

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    1. बहुत धन्यवाद आपको :)

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  3. प्रभावी लेखन -
    आभार आदरणीय-

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    1. आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  4. Replies
    1. शुक्रिया इमरान भाई :)

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  5. बहुत बढ़िया।
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    सादर

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    1. शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद यशवंत भाई।। और फेसबुक पर भी आपकी शुभकामनाओं वाली पोस्ट बहुत प्यारी लगी हमें।
      सादर
      मधुरेश

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  6. कि कई नावों में पैर यहाँ,
    ढूंढे अब कौन किनारा है!
    कोई बूझ के भी अनबुझ सा है,
    .बेहतरीन ............

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    1. धन्यवाद आपका। और ब्लॉग पर पहली बार आपके आने की हार्दिक ख़ुशी है मुझे।

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  7. दिन के घनघोर उजाले में
    अंतस में तम घर करता है,
    अब रात कहाँ आती है यहाँ,
    सबकुछ बेदार चमकता है!.....बहुत बढ़िया, अच्छा लगा
    new postक्षणिकाएँ

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  8. बहुत सुन्दर मधुरेश भाई.

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    1. शुक्रिया निहार भाई :)

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  9. अब तम-प्रकाश का फर्क कहाँ?
    दिन के घनघोर उजाले में
    अंतस में तम घर करता है,
    अब रात कहाँ आती है यहाँ,
    सबकुछ बेदार चमकता है!

    जगमगाती चकाचौंध .....और उदास मन ....
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...मधुरेश ।

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    1. आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  10. Replies
    1. रश्मि मौसी, आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  11. आज के हालात को सरलता से व्यक्त कर दिया ...
    बहुत ही प्रभावी ...
    जनम दिन की बधाई ...

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    1. शुभकामनाओं के लिए बहुत धन्यवाद। :)

      आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  12. बहुत ही सुन्दर ..........

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    1. बहुत धन्यवाद।
      सादर

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  13. कोई बूझ के भी अनबुझ सा है,
    कि फेक है क्या सचमुच सा है....
    यह तो अपना अपना विश्वास है ....जो कहता है वही सच है

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    1. आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  14. बहुत सहज, सरल और प्रभावी रचना, शुभकामनाएँ.

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    1. आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक है .. बस यूँही मार्गदर्शन मिलता रहे आपका।
      स्नेहाभिलाषी,
      मधुरेश

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  15. दिन के घनघोर उजाले में
    अंतस में तम घर करता है,very nice.....

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  16. दिनांक 06/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. समयाभाव के कारण आजकल प्रतिदिन हलचल के पोस्ट पढ़ पाना संभव नहीं हो पा रहा। बहरहाल, सप्ताहांत में अपने फॉलो किये हुए ब्लोग्स निश्चित पढता हूँ ... रचना लिंक करने के लिए आभार।

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  17. "अब तो जीते जो हारा है,
    सच से अब झूठ ही प्यारा है,
    कि कई नावों में पैर यहाँ,
    ढूंढे अब कौन किनारा है!
    कोई बूझ के भी अनबुझ सा है,
    कि फेक है क्या सचमुच सा है,
    होते थे कभी दिन-रात यहाँ,
    अब तम-प्रकाश का फर्क कहाँ?"...........बहुत सटीक प्रस्तुति
    अपने ब्लॉग पर आने का निमंत्रण दे रही हूँ ....आप आयेगीं तो मुझे ख़ुशी होगी
    http://shikhagupta83.blogspot.in/2013/03/blog-post_4.html

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    1. धन्यवाद आपका। और ब्लॉग पर पहली बार आपके आने की हार्दिक ख़ुशी है मुझे। आपका ब्लॉग निश्चित देखूंगा।

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  18. बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त
    वर्तमान की सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियाँ
    सटीक और सार्थक मधुरेश जी



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    1. बहुत धन्यवाद। और ब्लॉग पर पहली बार आपके आने की हार्दिक ख़ुशी है मुझे।
      सादर

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  19. होते थे कभी दिन-रात यहाँ,
    अब तम-प्रकाश का फर्क कहाँ?

    जिन्दगी कुछ ऐसे ही उलझ गयी है .....

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    1. सही कहा भाई आपने ... आधुनिकता की उलझन ...

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  20. सार्थक प्रस्त्तुति.

    शिवरात्रि की शुभकामनाएँ.

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  21. अच्छी रचना

    नीरज 'नीर'

    कृपया पधारें
    KAVYA SUDHA (काव्य सुधा):

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  22. सुंदर लिखा , बधाई आप को

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