Wednesday, October 3, 2012

ओ अंधियारे के चाँद



ओ अंधियारे के चाँद तेरी
चमक फीकी पड़ती जाए...
काले से पखवाड़े में क्यों
काला तू पड़ता जाए ?.. 

कोई देखे, कोई ना देखे
अब किसे कौन समझाए...
इस ओर से काला होकर भी
उस ओर तू चमका जाए..

तू है धरा के पास-पास,
चमके, कभी तू धुंधलाए...
क्यों पूनम की चमक तुझे
इक दिन से ज़्यादा न भाए..

देख तो सूरज चमके कैसे
हर दिन एक सुभाए...
तुझे धरा से दूर चमकना
क्यों फिर रास न आए?

अमानिशा के बाद तुझे
फिर से मेरी याद सताए...
मेरी अंधियारी रातों को
फिर से तू चमकाए!!

20 comments:

  1. मधुरेश भाई, एक और नगीना. वाह. अच्छा सोचा है आपने ..इस पार उस पार के बारे में. खुद कई बार अपनी ज़िंदगी भी तो ऐसी ही होती है. चेहरे पर खिलती मुस्कान और अन्दर निस्सीम तम.

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  2. Third verse onwards, it is so beautiful and profound. Loved the way you mentioned Sun as comparison. Beautiful poem.:)

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  3. बहुत सुंदर शब्द चयन से भाव सुंदरता से खिले हैं ...
    बहुत ही कोमल और सुंदर अभिव्यक्ति ....
    शुभकामनायें ....

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  4. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/10/1.html

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  5. One more poetry on moon :)
    good one....is anything special b?w moon and u ?? :D :P

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  6. visited ur blog after a long gap... Its still the same man...full of love, beauty n multi-dynamism.

    Cheers :)

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  7. होय पेट में रेचना, चना काबुली खाय ।

    उत्तम रचना देख के, चर्चा मंच चुराय ।

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  8. अमानिशा के बाद तुझे
    फिर से मेरी याद सताए...
    मेरी अंधियारी रातों को
    फिर से तू चमकाए!!

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  9. सुंदर चाँद
    शर्मा गया होगा
    कुछ भी नहीं
    कह पाया होगा
    कविता बस पढ़
    चला गया होगा !

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  10. पूनम-मावस दृष्टि-भ्रम,धूप-छाँव का खेल |
    चाँद कहे जीवन अरे! है सुख-दुख का मेल ||

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  11. सुन्दर शब्द चयन....अति सुन्दर भाव से भरपूर!

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  12. वाह...बहुत सुंदर..चांद के दूसरे पहलू को आपने बड़े सुंदर सवालों में पि‍रोया है..

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  13. न जाने क्यों अंधियारे के चाँद से मुझे भी गहरा आकर्षण है.

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  14. बहुत सुन्दर रचना..
    बहुत खूब
    :-)

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  15. बहुत सुन्दर लगी पोस्ट।

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  16. सुर , लय और ताल से सजी खूबसूरत रचना |

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