Thursday, April 12, 2012

ओढ़ने की चादर


मैं, साढ़े-पांच का.
और साढ़े-पांच की
मेरी चादर भी.
हर रात बस
एक ही कशमकश
या तू थोड़ी लम्बी होती,
या मैं ही थोड़ा छोटा होता!

Picture Courtesy: http://2.bp.blogspot.com/

23 comments:

  1. हाँ....कब तक कोई पांव ना पसारे..........

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  2. हजारों ख्वाईशें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दम निकले ....!!
    गहन अभिव्यक्ति ...
    शुभकामनायें .

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  3. पाँव मोड़ लेने का एकमात्र विकल्प है...
    शायद कशमकश कम हो!
    सुन्दरता से गहन बात कही गयी है आपकी रचना में!
    बधाई!

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  4. दो पंक्तियों में बहुत कुछ कह दिया आपने..

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  5. बहुत पुरानी बात हो चली .... उतने ही पाँव फैलाने चाहिए ,जितनी लम्बी चादर हो .... नया ज़माना ,नयी सोच के साथ कहावतें के मायनें भी बदलनी चाहिए .... !!

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  6. अनुपम भाव लिए सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट .

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  7. यह कशमकश ही समाधान दिलायेगा।

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  8. बेजोड़ भावाभियक्ति....

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  9. समझौता करते करते थक जाता है इन्सान , न थके इन्सान तो मुक्त कहाँ !

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  10. waah bahut hi sundar.

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  11. सार्वभौमिक कशमकश

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  12. ये चादर लंबी कर लीजिए नहीं तो मुड़ते-मुड़ते एक दिन पैर बगावत कर बैठेंगे..:)
    सून्दर

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  13. कविता बहुत पसंद आई।

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  14. बहुत खूबसूरत अंदाज़...कशमकश की ..

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  15. कल 17/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. यशवंत जी आपका और विभा मौसी का आभार... अभी परीक्षा में व्यस्त हूँ, इसीलिए ब्लॉग नहीं पढ़ पा रहा...इसके लिए खेद है...
      सादर
      मधुरेश

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  16. एक रास्ता है ...अपने सोने का पोस्चर बदल लीजिये .....कशमकश तो और भी हैं ज़िन्दगी में झेलने के लिए ....!!!!

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  17. इस कशमकश में पाँव ही सिकोड़ने पड़ जाते हैं

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