Wednesday, November 27, 2013

यात्रा


इच्छाओं का बहाव
विपरीत, प्रतिकूल।
जीवन की तलाश में 
मृत्यु का सा शूल।
दुर्गम जटिल पथ 
सदा सम्बलदायक।
परा-शक्ति पर करती
अंतस को उन्मूल।
जो गिरता सो उठता,
उठा हुआ गिर जाता, 
जो भूला सो सीखा,
जो सीखा करता भूल।
ख़ाक छान ही बना सिकंदर,
और बनके फांके धूल!

Picture Courtesy: Illusion of depth by Ariel Freeman http://arielfreeman.blogspot.com/

14 comments:

  1. ख़ाक छान ही बना सिकंदर,
    और बनके फांके धूल!
    सच मधुरेश..... बेहद उम्दा रचना ......!!

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  2. जीवन के पथ पर हिम्मत से चलते जाना है .....!!सुंदर रचना ...

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  3. शब्द-शब्द शिक्षाप्रद. गहरे सोच की उपज. अति सुन्दर मधुरेश भाई.

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  4. जीवन का एक और सच

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  5. सच कहती उत्‍कृष्‍ट पंक्तियां

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  6. कल 29/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  7. प्रिय ब्लागर
    आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

    welcome to Hindi blog reader

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  8. ख़ाक छान ही बना सिकंदर,
    और बनके फांके धूल!
    कटु सत्य !
    नई पोस्ट तुम

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  9. सुन्दर उत्‍कृष्‍ट पंक्तियां..

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  10. पूरा जीवन दर्शन है इन पंक्तियों में ....शुभकामनायें

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  11. बहुत सुन्दर विराधाभासों को बखूबी दर्शाया है आपने |

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  12. वाह...उत्तम...इस प्रस्तुति के लिये आप को बहुत बहुत धन्यवाद...

    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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