Saturday, May 2, 2009

सप्तपर्णा से चार पत्ते


१)
जीवन असमंजस का प्याला,
तम-प्रकाश की मिश्रित हाला.
सबल विवेक, निर्बल विकार हों 
आशाएं मेरी मधुशाला!

२)
ओ छल-साकी मत पिला अब
इतना कि होऊं मतवाला.
सुध-बुध की है यहाँ चौकडी,
अंतर्मन है मधुशाला!

३)
नयना मेरे मधुघट हैं और
चिर उमंग चांदी सा प्याला.
गरिमा की हाला प्रबोधिनी,
स्वर्णलता सी मधुशाला!

४)
रुकते-रुकते चल पड़े मन,
ऐसी आशाओं की हाला.
और चलके रुक जाए जहाँ पर
वहीँ-वहीँ हो मधुशाला

16 comments:

  1. Bahut accha.. Wonderful composition...

    ReplyDelete
  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 19- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... जिंदगी ऐसे भी जी ही जाती है .

    ReplyDelete
  3. संगीता स्वरुप जी, विवेचना एवं अनुशंषा के लिए धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. सुन्दर...
    मधुर मधुशाला...

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर ……

    ReplyDelete
  6. वहां बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

    ReplyDelete
  7. वाह बहुत खूब
    उम्दा

    ReplyDelete
  8. बहुत ही बढ़िया।

    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर।

    सादर

    ReplyDelete
  9. एक निवेदन
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।
    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।
    Login-Dashboard-settings-comments-show word verification (NO)

    अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न वीडियो देखें-
    http://www.youtube.com/watch?v=L0nCfXRY5dk

    ReplyDelete
  10. विद्या जी, वंदना जी, सदा जी, अंजू जी, यशवंत जी : बहुत धन्यवाद, ख़ुशी हुई कि आपको अच्छी लगी!!
    यशवंत जी: Disable कर दिया है मैंने अब :)

    ReplyDelete
  11. हलचल पर मिली आपकी यह कविता बहुत ही सुंदर लिखते हैं आप आपकी यह रचना पढ़कर बच्चन जी की मधुशाला याद आगी मुझको बहुत खूब

    ReplyDelete
  12. pat ek hi roop aanek ;aage badhte gana musafir aage badte gana

    ReplyDelete
  13. मधुरेश , आपने मुझे ही अपनी रचनाओं से पुन: मिलाया है . सच! मैं भी विस्मृति में थी. नि:संदेह प्रसन्नता हुई. वैसे भी रचना कलम से निकलने के बाद मेरी रहती भी नहीं है और पुन:पढ़कर मैं भी अर्थों को आत्मसात ही करती हूँ. आभार व्यक्त करूँ क्या? मेल करती पर ...

    ReplyDelete
  14. wow.. bahut a66e...waise to madhushala amar hai...lekin uski amaratva me halchal paida kiya madhushala ko isis trh jevet rkhne ke liye dhanyavad/... sri bachchan sir hamare adarsh me se ek kavi the...aj v ankhon me pani aati hai madhushala ke lines padh ke....dhanyavaad...bahut bahut khub likha hai apne...

    ReplyDelete