Saturday, April 23, 2011

इस पार प्रिये बस यादें हैं



एक सूनापन,एक खालीपन
बेनूर पड़ा मन का दर्पण.
उस पार तो हर क्षण जीवन था,
इस पार वही नीरस नर्तन.

उस पार प्रिये रस था उर में,
हर सांस में खुशबू बसती थी.
हर शब्द शहद सा मीठा था,
नयनों से नेह बरसती थी.

उस पार था मन संगीत भरा,
गीतों में प्रेम झलकता था.
हर मुखड़ा मनभावन लगता,
चहु-ओर स्नेह छलकता था.

उस पार तो जैसे अवनि पर
मुझको था अद्भुत स्वर्ग मिला.
उर से उर की बातें होतीं,
निजवर्ग मिला, सुखसर्ग मिला.

इस पार प्रिये बस यादें हैं,
पल चार बिताये जो तुम संग.
ना रस उर में ना कोई मधु,
बस मन का रंग- तुम्हारा 'रंग'.


Inspired by the poem:
"इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा! "
-हरिवंशराय 'बच्चन'

Saturday, March 26, 2011

छोटी सी बात


कौन सी समस्या है जिसका समाधान नहीं है!
या कि हार के बाद जीतने का विधान नहीं है!
बस इतना समझिये कि ज़िन्दगी आसान नहीं है.
हर बात मुमकिन है वहां, जहां अभिमान नहीं है.


Monday, March 7, 2011

एहसास


"..रुकते रुकते चल पड़े मन,
ऐसी आशाओं को हाला,
और चलके रुक जाय जहाँ पर,
वहीँ वहीँ हो मधुशाला!.."

मैंने मंदिर मस्जिद जाकर
ढूँढा प्याला, ढूंढी हाला
सन्मुख बैठा संत जनों के,
नहीं सधा मन मतवाला.
जब भी तेरा ध्यान लगाया
भूला, भटका, भरमाया.
अब जा के एहसास हुआ कि
कहाँ नहीं है मधुशाला!