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Friday, August 24, 2012

कुछ बूँदें ओस की...



दो नयना भरे-भरे से हैं
स्नेह से, आशाओं से...
जाने क्यूँ परे-परे से हैं
अनदेखी परिभाषाओं से...

मुख पे मद्धिम मुस्कान कहीं
इक स्वप्न कोई पुलकित करतीं...
कुछ डूबे से, कुछ उबरे से
मीठे ख़याल अंकित करतीं...

हाँ दूर कहीं उन स्वपनों में
नव-जीवन की आवृत्ति है...
जो था सुषुप्त, अब है जगा
मन नवल-रूप आकृति है...

सोचूं तो सबकुछ है मन में,
कितनी गहरी संतृप्ति है...
बस नेह भरा ही मन मेरा
प्रारब्ध है, स्मृति है...

Thursday, March 22, 2012

मधुशाला तुम पे लिख डालूँ





इक सुन्दर, श्रृंगार की कविता
दिल करता तुम पे लिख डालूँ.
कुछ शब्द संजोऊँ मीठे से,
मधुशाला तुम पे लिख डालूँ.

पलकें जब उठती-गिरती हैं
खाली प्याला भर जाता है,
तुम्हे देख-देख ही नयनो में
पुरज़ोर नशा चढ़ जाता है.

किन शब्दों से मुख के रज का
करूँ वर्णन मैं इस नीरज का!
मन रजनि पा तुम सा मयंक,
बस तृप्त-तृप्त हो जाता है.

मुस्कान मृदुल मनमोहक जब
बनकर कुसुम मुख पर खिलती,
जी करता उनको चुन-चुन कर
इक माला उनकी गढ़ डालूँ.

कुछ शब्द संजोऊँ मीठे से,
मधुशाला तुम पे लिख डालूँ.

Picture Courtesy:Priyadarshi Ranjan

Dedicated to Abhishek Bhaiya and Bhabhi :) Wedding gift :)

P S : 'बच्चन' की 'मधुशाला' से इन पंक्तियों का न तो कोई सरोकार है, न ही तुलना की जा सकती है.... पाठकगण से अनुरोध है की इसे simply  एक श्रृंगार की कविता के तौर पर पढ़ें. आभार!

Thursday, March 15, 2012

इन उजालों से गुज़ारिश है...


काश कि इस दिल में
इक दरवाज़ा होता,
जिसे खोल देता मैं
और जी भर के भर लेता
इन उजालों को.

काश कि ख्वाबों की भी
कोई हार्ड डिस्क होती,
और स्टोर कर लेता मैं
इन लम्हों के
नायाब ख़यालों को.

काश कि इन पलों को
थमने की सहूलियत होती,
और अंतर के संगीत पर
थिरकता ये सुरमयी मन
ले जाता पराकाष्ठा पर
उमंग भरे तालों को.

Picture Courtesy: http://www.416-florist.com/flowerblog/holiday-flowers/white-flower-arrangements.html

Sunday, January 22, 2012

सांवली



सांवली
हाँ, सांवली है वो!
और उसका रूप भी तो
इसी सांवलेपन से निखरता है!
उसका सांवलापन ही उसमे
कनक-सी आभा बिखेरता है!
उसके मुख-विन्द को
अनुपम-सा ओज देता है!
उसके होठो की मुस्कान को
माधुर्य-सिक्त कर देता है!
अगर वो गोरी होती,
तो ये बात होती ही नहीं!
इसीलिए तो सांवली है,
या फिर वो होती ही नहीं!

Thursday, December 8, 2011

स्पर्श




सहसा ही छू लेते हो मन को तुम,
और साँसें बस थमी रह जाती हैं.
आवाज़ धडकनों की इतनी तेज़
कि कानों तक गूँज जाती है.
दिल उमड़ता है ऐसे कि जैसे
सब कुछ न्योछावर कर दे!
कितनी विह्व्हलता आ जाती है!
प्रेम औ' समर्पण के समागम में
तृष्णा बस लेष रह जाती है.
और एक ही कुछ होता है,
थोड़ा तुम-सा, थोड़ा मुझ-सा,
पृथा बस घुल सी जाती है!

Picture Courtesy: http://artandperception.com/2008/03/natural-abstracts.html

Sunday, August 21, 2011

तुम याद बहुत आते हो!






कैसे लिख दूं गीत किसी दिन?
कैसे शब्द पिरोऊँ तुम बिन?
ये अंतर, जो है उद्विग्न सा,
क्यूँ उसको और जलाते हो?
तुम याद बहुत आते हो!

कानों में बस शब्द तुम्हारे,
उर में सौम्य-सरसता धारे,
चाहे जितनी दूर रहूँ मैं
तुम उतना पास बुलाते हो!
हाँ, याद बहुत आते हो!

प्रेम की सीमा अंकित करके,
अपनी सृष्टि परिमित करके,
जब जाता मैं मन विमुख करके,
किस डोर फिर खींचे जाते हो?
तुम याद बहुत आते हो!

Picture : China Rose (Rosa sinensis) (from my garden back home!)

Friday, July 29, 2011

Village on the go


 
पंख पंखुडियां,
पतली पगडंडियाँ,
बाग़- बागीचे,
खेत खलिहान.


ऊपर नीरद,
नीचे नहरें,
पीली सरसों,
सुनहरी धान.


बरसे बरखा,
रोमिल रिमझिम,
सुमधुर सावन
का आदान.


बाह्य धरा तो
है संतृप्त-सी,
फिर भी आतुर
ये अन्तःकरण


आशाओं की
घिरी घटा में,
मुग्ध-मधुर हो
मचले ये मन.


Dedicated to: Amit Bhaiya, Swarnlata Di, Supratim da, Garima Di and Shikha Di 

Monday, February 21, 2011

मधुमास



मन की अनबन को छोड़ सखी,
मैं चली पिया के पास.
जो जग छूटे, मोह न मोहे,
बरबस बस इक आस.

पिया प्रेम के आराधन हैं,
उर में उनका वास.
इस बौरन ने घट-घट ढूँढा,
उनका प्रेम निवास.

अथक साधना से पाया है,
ये पावन एहसास.
जो कुछ भी है, सब तेरा है,
तेरी हर इक सांस.


पूर्ण समर्पण मेरा जीवन,
अब ना कोई कयास.
पिया पियारे तीन रंगों में,
रंगा मेरा मधुमास.




Picture Courtsey: Oil paintings reshared from the blog- http://jeanleverthood.blogspot.com/2009/05/poppies-oil-painting-yes-more-poppies.html

Wednesday, February 16, 2011

क्या तुम-सा कोई और कहीं है?




तुम हो जैसे शहद सुमन में.
पारिजात किसी कानन में.
या पावन अभिलाषा कोई
किसी मनीषि के साधन में.
गीत नया है, रीत नयी है.
क्या तुम-सा कोई और कहीं है?


तुम्हे देख मन खिल जाता है,
अपने बिम्ब से मिल जाता है.
जब भी तुम सन्मुख होती हो,
अंतर्मन निखिल पाता है.
तुम हो जहां, बहार वहीँ है.
क्या तुम-सा कोई और कहीं है?


मीठी-प्यारी तुम्हारी बातें,
रोम-रोम पुलकित कर जाती.
इक मधुर मुस्कान तुम्हारी
बुझता मन जीवित कर जाती.
तुम-सा सानी कहीं नहीं है.
क्या तुम-सा कोई और कहीं है?


Picture: A shot taken in Kem Sentosa (Malaysia)


For my hypothetical girlfriend, jo hai, kahin na kahin! :)

Wednesday, November 17, 2010

तुम्हारी प्यारी बातें

अब जाना है मैंने

कि एहसास होता है कैसा,

बाँछों के खिल जाने में.

अब जाना है मैंने

कि ख़ुशी होती है कितनी,

पुरानी बातें याद आने में.

भूली बिसरी यादें,

बिन निंदिया की रातें,

याद आती हैं मुझे,

तुम्हारी प्यारी बातें.