Sunday, January 5, 2025

ए आई

 


जहां जाना है, उस ओर कदम नहीं बढ़ रहे,
और जहां नहीं जाना, मन वहीं खींचा जाता है!
यह आत्मबल क्या चीटियों से भी क्षीणतम नहीं?
इस मन का हाल क्या दुर्योधन से भी कम नहीं?
जो जानता है धर्म क्या है, फिर भी प्रवृत्ति नहीं,
और पता है अधर्म क्या है, फिर भी निवृत्ति नहीं!
आखिर यह दुर्योधन इतना बलशाली कब हुआ,
और बुद्धिरूपेण अर्जुन इतना खाली कब हुआ?
क्यों विषाद-स्तब्ध वह कृष्ण को नहीं पुकारता?
गीता के अगले अध्याय के पृष्ठ तक नहीं निहारता!
कब इतना जकड़ गया कि तामसिक बन गया?
स्वयं के बनाएं तार में ही कितना उलझ गया!
नेचुरल इंटेलिजेन्स से परिपूर्ण अर्जुन अब हारने लगा है,
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब बाजी मारने लगा है!

५ जनवरी २०२५
बॉस्टन 


Monday, May 23, 2022

रिश्ते!



वीणा के समान
कई तारों से बंधे,
तान कर सधे
होते हैं रिश्ते! 

जिनके दो छोड़
होते है दो व्यक्ति
और मधुरिम संगीत
रिश्तों की अभिव्यक्ति।

प्रेम, आकर्षण,
श्री और समर्पण
हैं ये चार तार
रिश्तों के आधार!

इन चार तारों को
समय परखता है.
उत्तम वही जो
सामंजस्य रखता है!

तनाव कम
तो संगीत लुप्त!
लगाव कम
तो रिश्ते सुप्त!

तनाव अधिक
तो टूट जाते हैं!
लगाव अधिक
तो फूट जाते हैं!

जो टूटे कभी
एक भी तार
तो हिल जाता है
रिश्ते का आधार!

फिर भी टिका रहे,
अगर एक भी तार,
तो टिका रहता है
इकतारे सा आधार!

ऐसे लम्हों में
सम्बल भर देना,
न भी संभले तो,
रिश्ते न खोना!

मन में रखना
दृढ़ विश्वास,
बस करते रहना
एक और प्रयास!

कि ये आखिरी तार
बना रहे, न टूटे!
साथ जो सदा का था
वो व्यर्थ ही न छूटे!

Tuesday, May 17, 2022

संतान






संतान
संतृप्ति का सृजक है 
संतान
जीवन चक्र का पूरक है

संतान
प्रकृति के ऋण का त्राण है 
संतान
अपने प्राणों में नया प्राण है

संतान
हास्य है, रुदन है, क्रंदन है 
संतान
ह्रदय का मधुरिम स्पंदन है

संतान
बल है, शौर्य है, श्रियं है
संतान
कुल का कौस्तुभ प्रियं है

संतान
गर्व है, अभिमान है 
संतान
अपने होने का सम्मान है


Saturday, October 22, 2016

ओ वराभय!


बहुत दिनों से ब्लॉग जगत से दूर रहा। बहुत 'मिस' भी करता रहा। शोध कार्य चरम पर था, अतः व्यस्तता बढ़ गयी। ईश्वर के कृपा से पीएचडी पूरी हो गयी! अब नियमबद्ध यहाँ आते-जाते रहने का प्रयास रहेगा। 




चिरनिद्रा सी जीवन तम में,
विराज रही जाने किस भ्रम में!
इक आहट जो होश में लाये,
भयाक्रांत, व्याकुल कर जाए।  
जो क्षण सत्य का भान कराये,
वही न जाने क्यूँ छिप जाए!
बढ़ता पग जब थम-थम जाये,
ये मूढ़ फिर किस पथ जाये?

बाहर का कौतूहल सारा,
बस प्रयास निष्फल-निस्सारा।
फिर भी मूढ़ा दौड़ रहा है,
व्यर्थ की कौड़ी जोड़ रहा है!
दो क्षण भीतर झाँक है लेता,
औ' स्व को है सांत्वना देता,
'मैं हूँ!', हाँ, मैं सचमुच में हूँ!
थोड़ा सा हूँ, पर तुझमें 'हूँ'! 


Picture Courtesy: http://pre14.deviantart.net/695f/th/pre/i/2015/234/8/3/abstract_shiva_by_ani460-d96pcpy.jpg

Thursday, March 10, 2016

हे बुद्धिजीवीयों



​मनुस्मृति ही क्यों, तुम 
वेद-पुराण भी जला डालो,
धर्म, शास्त्र, नीतियों को 
तुम हँसी में ही उड़ा डालो! 

वैसे भी इन्हे समझ पाना, 
तुम्हारे बस की बात नहीं,
'सत्य' भी क्या जलेगा कभी?-
तुम चाहे जितना जला डालो !

यह कुकृत्य भी नहीं ऐसा कि
सिर-कलम की बात भी होगी! 
प्रखर होगा प्रहार से धर्म ही
तो बात किस आघात की होगी?

निश्चय ही हे 'बुद्धिजीवीयों',
यह काल है मंथन का अभी,
विष-अमृत सब ही अलग होंगे,
तुम चाहे जितना मिला डालो!

Wednesday, August 5, 2015

जागो कर्मयोगी

*************************
"तम-प्रकाश से पूछता रहा मैं- 
कौन हूँ मैं, कहो कौन हूँ मैं ? 
सब कुछ में कुछ भी नहीं मैं,
कुछ-कुछ में भी सब कुछ ही मैं!"
*************************



सूर्य प्रखर है, तेज प्रहर है,
जगमग रौशन है जग सारा,​
सारी सृष्टि जाग चुकी है,
क्यों तेरे मन में अँधियारा ?

हर निशा का आँचल तुझको
दे गया है एक सितारा,
तम का आलिंगन होता है,
सदा नए सुबह का इशारा। 

ये भोर है जीने का, और
जी कर कुछ कर जाने का,
मुट्ठी बंद कर, खोल ले आँखें,
अवसर आते नहीं दोबारा!  

आज ठान ले आलस तज कर,
जीवन-कला की कहती ज्वाला-
'कर्मयोग' का पथ चलना है,
सुधि में भी औ' परे सुध-कारा!



Picture Courtesy: http://cdn.dailypainters.com/paintings/_other_side_of_the_earth__abstract_landscape_day_a_d8de0c0927cf4da0c56b51c39a0e669d.jpg

Friday, November 7, 2014

जीवन पूरन कर आई!



अरसों-बरसों से सूखी-सी
सब सन गयी औ' लिपट आई,
सुमनों से संचित मन की धरा
खुशबू से महक-महक आयी।

नव-जीवन अभिनन्दन हेतु
वंदन, चन्दन भी कर आई,
कर आलिंगन, मिल मन से मन
तन-मन सब अर्पण कर आई। 

जो बिम्ब बसा इन नयनों में,
उनपे ही नयन निमन आई,
नित-नित जो नव-नव रूप गढ़े,
उस नेह का नर्तन कर आई।

बहती श्वांसों की गंगा में,
वो डूबी, और उबर आई,
बस प्रेम को पाकर जाना कि
सब जीवन पूरन कर आई।


Picture Courtesy: http://www.layoutsparks.com/1/116318/what-is-love-abstract.html

Saturday, August 2, 2014

प्रेम-पाती



मन की अवनि पर धूप खिला,
नव जीवन को आधार मिला,
बीता तम घन, बीती रातें,
जब प्रीत मिला, मनमीत मिला।

नव-स्वप्नों का अम्बार लिए,
जीवन स्वागत हेतु आई,
खुशबू बिखरी चहु ओर दिशा,
सुमनों की बरखा कर लाई।

जीवन कोरा कागज़ सा है,
प्रियतम के नेह है रंग सभी,
हर कोना रंग भर जाएगा,
जो साथ भरेंगे रंग कभी।

दो जीवन का ये विलय सदा,
अनुभूति का आधार बने,
हो अक्ष-अक्षिका सा तालमेल,
और मधुर मधुर संसार बने।


Picture Courtesy: http://images2.layoutsparks.com

Saturday, July 12, 2014

Rebirth

Dedicated to my friend/colleague Josh White, who is fighting his war against Cancer. I wish him a speedy recovery.


In the early hours of dawn,
when only a few were awake,
a plantlet was carving its ways
to catch the bit of scanty rays. 

The night past was dark,
'n the veil of ignorance stark,
when nothing was conscious,
and nothing had any spark.

But before the rays could reach,
the dark clouds covered the sky.
The wind blew with all its might,
the rain poured across the sight.

It lost a few leaves, a few buds,
but stoood firm against the cope, 
for the rays that it was hoping for
were indeed the rays of hope.

The clouds, the wind and the rain,
it suffered with calm all the strain,
and holding its roots it stood,
persevering through again 'n again. 

And now it blooms and fruits,
its existence speaks of its passion,
to have faith 'n determination,
'coz it's all only in the perception. 


*********************************
Overcoming all the hardships,
traversing through the hard rocks,
may we welcome our rebirth,
accepting all the toils with mirth.
*********************************

Picture courtesy: http://www.myhdwallpapers.net/slice-of-paradise/154/

Friday, June 13, 2014

क्षुद्रता


मन मेरा जुगनू की भांति
बुझता औ' जलता रहता है।
इक तुच्छ क्षुद्र सा भाव लिए
चहु ओर भटकता रहता है।

तुम श्रोत हो अविरल रश्मि के,
तुम्हे पाने से क्यों डरता है!
क्यों अपनी ही मर्यादा को
साकार समझता रहता है!

कितना ही तुच्छ हो कोई भी,
इक अहम खटकता रहता है।
बंधकर ख़ुद की सीमाओं में,
ख़ुद से ही लड़ता रहता है।

तुम नेह-प्रेम के सागर हो, 
ये खड़ा किनारे रहता है।
डूबा तो दम भर जाएगा,
ये सोच डुबकी से डरता है

तुम स्वयं सत्य हो, स्वयं चित,
आनंद तुम्ही में रहता है।
फ़िर भी जग की पीड़ाओं को
अविराम ये सहता रहता है।

तुम्हे पाने को, मिल जाने को
ये सदा तरसता रहता है।
औ' बुझते, जलते अंतस की
उत्कंठा प्रज्ज्वल करता है!



Picture Courtesy: http://wolimej.com/wallpapers-beautiful-love-abstract-for-desktop-free/


Thursday, January 9, 2014

फिर से रंग दे!



मन कलिक-कालिमा लिप्त हुआ,
नयनों में भी बस धुआं-धुआं,
अधरों की हंसी भी खोयी सी,
अंतस का दीप भी बुझा हुआ.
इस रंगहीन को अपना संग दे,
रंगरेज़ मेरे, चल फिर से रंग दे!

बीती का बोझ बड़ा भारी है,
इसमें दबती दुनिया सारी है.
किसका पथ निष्कंटक होता है,
किसमें केवल कुसुम क्यारी है!
बीती बिसार, पग नव-पथ धर दे,
रंगरेज़ मेरे, चल फिर से रंग दे!


रंग पक्का कच्चे से ही होता है,
वो ही पाता है, जो खोता है,
कौन ही अथक निखर पाता है,
जो ख़ुद ही सपनों में सोता है!
अब मन बसंत, तन धानी कर दे,
रंगरेज़ मेरे, चल फिर से रंग दे!

Wednesday, November 27, 2013

यात्रा


इच्छाओं का बहाव
विपरीत, प्रतिकूल।
जीवन की तलाश में 
मृत्यु का सा शूल।
दुर्गम जटिल पथ 
सदा सम्बलदायक।
परा-शक्ति पर करती
अंतस को उन्मूल।
जो गिरता सो उठता,
उठा हुआ गिर जाता, 
जो भूला सो सीखा,
जो सीखा करता भूल।
ख़ाक छान ही बना सिकंदर,
और बनके फांके धूल!

Picture Courtesy: Illusion of depth by Ariel Freeman http://arielfreeman.blogspot.com/

Tuesday, September 10, 2013

संशय


एक वृत्त बाहर,
एक वृत्त भीतर
सिकुड़ती त्रिज्याएँ,
घुलती मिथ्याएं
सघन संकुचन,
अंतस क्रंदन
उच्छावास-निश्वास मे
उलझा हुआ प्राण,
निर्वात को कहे क्या-
जीवन या मृत्यु?

जो ये सिकुड़न घोल दे
भीतर का वृत्त, 
तो कर्म के बंधन में
फिर से आवृत्त
एक जीवन फिर ढूँढूँगा
या फिर टूट जाय अगर 
बाहर का वृत्त,
तो हो जाऊं अन्वृत्त,
अनाकार, निर्विचार
जीवन से परे-
या मृत्यु में घुल जाऊंगा?
 
 
Picture Courtesy: http://pressingpause.com/2012/03/19/extra-circular-activities/

Friday, June 28, 2013

उठो अभिमन्यु ... से प्रेरित होकर

जेन्नी आंटी की  ये रचना पढ़ी (http://lamhon-ka-safar.blogspot.com/2013/06/410.html). मन में कुछ दिनों से कई सारे प्रश्नों का घेराव था- उन पंक्तियों ने बहुत संबल दिया।
------------------------------------------------------------------------------------------------------------

बस लड़ना भर सीखा मैंने
ना सीखी पलटवार की युक्ति!
पर जानूं और समझूं अब मैं,
नव-युग में अनुबंध की सूक्ति!

नहीं चाहता अबकी मिटना,
सह लूँगा व्रण-शूल-वेदना,
कर सीमित अपनी संवेदना,
वज्र-प्रबल बन मुझको लड़ना। 

आशाओं का दीप कहाँ
मरने-मिटने में जलता है,
ये तो केवल वीर मनुज के
उठकर लड़ने में जलता है। 

बाहर कुपित, कलुषित, कुंठित
है शक्तिहीन, निज-सीमित 'मैं',
पर ओज तेज प्रताप प्रबल
भीतर में एक असीमित 'मैं'। 

मन में ठानूं कि भेद सकूं-
हो चक्रव्यूह जितना भी जटिल।
और भेद लड़ूं, डटकर निकलूँ 
हो चाहे शत्रु कितना ही कुटिल। 

है युद्ध बदला, बदली नीति,
मगर न धर्म हुआ अवसादित,
करे कपट कितना भी कोई,
मैं लडूँ, तो लड़ूं बस बन मर्यादित।

और हाँ माँ वचन तुमको देता हूँ,
हर चक्रव्यूह भेदता जाऊंगा मैं,
बन खुद तलवार और खुद ही ढाल,
अब जीत ही वापस आऊंगा मैं।

~ जेन्नी आंटी की रचना 'उठो अभिमन्यु ...' पर आधारित और ये पोस्ट उन्हें ही सादर समर्पित है।


Saturday, April 13, 2013

लाइफ का हैंग-ओवर



जीवन का मदिरालय प्यारा,
भांति-भांति से भरता प्याला,
रंग हो चाहे जो हाले का,
नशा सभी ने जम के पाला। 

ज्यों ही एक नशे की सरिता
करे पार, हो जाए किनारा,
त्यों ही दूजी सरिता आकर
मिल जाए, बह जाए किनारा।

हर पग रुकता, थमता-झुकता,
फिर भी आगे बढ़ता रहता,
कौन नशा जीवन से बढ़कर-
डगमग में भी स्वयं संभलता!

हर निशा में एक मधु है,
हर तम लाती एक नशा है,
हो अधीर फिर भी है पीता,
भूले स्मृति-उसकी मंशा है।

लेकिन भूल कहाँ पाता है!
स्मृतियाँ फिर भी आती हैं। 
और नशे में नित-नित नव-नव
श्रृंखलाएं बनती जाती हैं।

मगर अंत में एक प्रकाश फिर 
अंतस उज्जवल कर जाता है,
बड़े जतन से जाते जाते
ही लाइफ का हैंग-ओवर जाता है!

Picture Courtesy: Priyadarshi Ranjan

Thursday, March 28, 2013

कौड़ियों के दाम भी न बिका


पैसे की तंगी ने
मजबूर किया मुझे
खुद को बेच डालने को।
तो निकल पड़ा मैं भी
इस बाज़ार में
अपना मोल लगाने को।
खुद की खूबियाँ गिनी,
खुद की खामियां गिनी,
भई
नेकी है, ईमान है,
उसूलों वाला इंसान है,
सोचा,
दाम तो  अच्छा ही लगेगा,
मगर बाज़ार की डिमांड
तो कुछ और ही थी,
मक्कारी, जालसाजी, दिखावा
येही गुण बिक रहे थे,
दिन भर कड़ी धूप में
बोली लगाता रहा अपनी,
और शाम को मायूस होकर
घर आ गया मैं,
अफ़सोस,
कि कौड़ियों के दाम भी
न बिक पाया मैं!


Picture Courtesy: http://sangisathi.blogspot.com/2011_11_01_archive.html

Thursday, March 21, 2013

मकां आसमां है तेरा


ज़मीं पर है तू मगर मकां आसमां है तेरा,
इन पैरों को पर बनने की ख्वाहिश तो दे ज़रा।

ये हकीक़त जो है, सपनों से सजा ही तो है,
नींद आँखों से हटा, सपनों का दीदार तो करा।

रुख़ हवाओं का भी बदलता है इक दौर के बाद,
भरके दम उनको इस सीने से गुज़रने तो दे ज़रा।

कोई रोके, कोई टोके, क्या ही परवाह हो किसी की,
तुझे जिसकी भी हो परवाह, कदम उस ओर तू बढ़ा।

कहीं थकना, कहीं गिरना, फिर संभलना है मधुर,
राह की राग है अनोखी, बस हो मन सुर से भरा।


Picture Courtesy: http://www.guernik.com/en/ilustracion

Wednesday, February 27, 2013

अब रात कहाँ आती है यहाँ!



इक दौर मुक़म्मल होता था
सच-झूठ का, जीत-हार का,
इक दौर था जीने-मरने का,
इक दौर था नफरत-प्यार का.
अब तो जीते जो हारा है,
सच से अब झूठ ही प्यारा है,
कि कई नावों में पैर यहाँ,
ढूंढे अब कौन किनारा है!
कोई बूझ के भी अनबुझ सा है,
कि फेक है क्या सचमुच सा है,
होते थे कभी दिन-रात यहाँ,
अब तम-प्रकाश का फर्क कहाँ?
दिन के घनघोर उजाले में
अंतस में तम घर करता है,
अब रात कहाँ आती है यहाँ,
सबकुछ बेदार चमकता है!

Saturday, February 16, 2013

मन माटी रे!




सुख की वृष्टि, दुःख का सूखा,
कभी तुष्ट, कभी प्यासा-भूखा,
वन हैं, तृण है, नग है, खोह है,
विस्तृत इसकी चौपाटी रे!
मन माटी रे! 

नेह नीर से सन सन जाए,
कच्चे में आकार बनाए,
और फिर उसको खूब तपाए,
ये कुम्हार की बाटी रे!
मन माटी रे! 

मेड़ बना चहु ओर जो बांधे,
फिर क्या कलुषित लहरें फांदे!
तुष्ट ह्रदय सम शीत उष्ण जो,
सुफल तरुवर उस घाटी रे!
मन माटी रे! 

जो बहाव को बाँध न पाए,
या कच्चे में तप ना पाए,
और लहरों में घुलता जाए,
खुद की नियति फिर काटी रे!
मन माटी रे!

Tuesday, January 22, 2013

उठ के हुंकार पुरजोर लगा

'नेताजी' सुभाषचंद्र बोस आज अगर होते, तो फिर से उन्हें एक 'आजाद हिन्द फ़ौज' बनानी पड़ती, वो भी अपने ही हिन्दुस्तानियों के खिलाफ लड़ने के लिए।   एक गीत उनकी प्रेरणा से:




क्यों कलरव का है ग्रास बना?
क्यों शिथिल आत्म-विश्वास बना?
क्यों नियति का है दास बना?
उठ के हुंकार पुरजोर लगा।

क्यों क्षुब्ध हुआ, संवेदनहीन?
क्यों बना समाज चरित्रविहीन?
तप-ताप बढ़ा, हो नष्ट मलिन,
उठ के हुंकार पुरजोर लगा।

तज क्लीय तू पौरुष मन में ठान,
कर वध जो करे स्त्री अपमान,
हो इस समाज का नवर्निर्माण,
उठ के हुंकार पुरजोर लगा।

'जय हिन्द'

Picture Courtesy: http://www.flickr.com/photos/humayunnapeerzaada/6480943555/

राष्ट्र हित मे आप भी जुड़िये इस मुहिम से ... 

http://www.change.org/petitions/set-up-a-multi-disciplinary-inquiry-to-crack-bhagwanji-netaji-mystery#share