Madhushaalaa: The Nectar House
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Tuesday, January 24, 2012
जिजीविषा
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विवाद, विषाद, उन्मत्त उन्माद, अंतर था तम का अविरत प्रामाद. अब है स्थिर, शांत, गंभीर, न कोई रक्ति, न कोई वाद. अंतरमन ने पू...
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Sunday, January 22, 2012
सांवली
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सांवली हाँ, सांवली है वो! और उसका रूप भी तो इसी सांवलेपन से निखरता है! उसका सांवलापन ही उसमे कनक-सी आभा बिखेरता है! उसके मुख-विन्...
13 comments:
Wednesday, January 18, 2012
हदों तक
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कभी हीरे-सा चमक उठे, कभी धुंध में खोये रहे, नींदों में जागते रहे, उजालों में सोये रहे! जब कभी मूक थे, तो सुनते भी न थे, अब...
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