Madhushaalaa: The Nectar House
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Sunday, August 21, 2011
तुम याद बहुत आते हो!
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कैसे लिख दूं गीत किसी दिन? कैसे शब्द पिरोऊँ तुम बिन? ये अंतर, जो है उद्विग्न सा, क्यूँ उसको और जलाते हो? तुम याद बहुत ...
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Friday, July 29, 2011
Village on the go
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पंख पंखुडियां, पतली पगडंडियाँ, बाग़- बागीचे, खेत खलिहान. ऊपर नीरद, नीचे नहरें, पीली सरसों, सुनहरी धान. बरसे...
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Sunday, July 3, 2011
अहा ज़िन्दगी
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लम्हों-लम्हों में समाती सी ज़िंदगी, बूँद-बूँद में सिमटती सी ज़िंदगी. ख्वाहिशों के ऊंचे आसमान में उड़ान को मचलती सी ज़िंदगी. ...
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