Madhushaalaa: The Nectar House
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Friday, July 29, 2011
Village on the go
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पंख पंखुडियां, पतली पगडंडियाँ, बाग़- बागीचे, खेत खलिहान. ऊपर नीरद, नीचे नहरें, पीली सरसों, सुनहरी धान. बरसे...
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Sunday, July 3, 2011
अहा ज़िन्दगी
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लम्हों-लम्हों में समाती सी ज़िंदगी, बूँद-बूँद में सिमटती सी ज़िंदगी. ख्वाहिशों के ऊंचे आसमान में उड़ान को मचलती सी ज़िंदगी. ...
2 comments:
Saturday, May 28, 2011
बादल कब तक धरती को छाँव देगा?
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जितनी धरती झुलसी जाती, वो उतना ही संचित करता है. उसके त्यागे बूँद बूँद से, अपनी सीमा विस्तृत करता है. और फिर अपना ह्रदय ब...
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