Madhushaalaa: The Nectar House
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Wednesday, September 22, 2010
बढ़ता रह निरंतर
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तू प्रगति पथ पर, बढ़ता रह निरंतर. सरिता की भांति पीछे छोड़ता चल राह के चट्टान पत्थर, बढ़ता रह निरंतर. झील की भांति सीमित रखा कर अ...
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Friday, September 17, 2010
फिर से मेघ घिर आये हैं
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चांदी की सी चमचम इनमें या फवें हों रुई की जैसे खूब चले हैं बनठन कर और गरज गरज इतराए हैं. फिर से मेघ घिर आये हैं. मन की सूखी धरा...
7 comments:
Tuesday, May 25, 2010
पूर्णमासी
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एक आँख में काजल, दूसरे में बादल छाए हुए हैं, कहाँ उदासी है? घेरे में टूट रहा है 'चाँद' का दम, और सभी समझते हैं, आज पूर्ण...
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