ओ अंधियारे के चाँद तेरी
चमक फीकी पड़ती जाए...
काले से पखवाड़े में क्यों
काला तू पड़ता जाए ?..
कोई देखे, कोई ना देखे
अब किसे कौन समझाए...
इस ओर से काला होकर भी
उस ओर तू चमका जाए..
तू है धरा के पास-पास,
चमके, कभी तू धुंधलाए...
क्यों पूनम की चमक तुझे
इक दिन से ज़्यादा न भाए..
देख तो सूरज चमके कैसे
हर दिन एक सुभाए...
तुझे धरा से दूर चमकना
क्यों फिर रास न आए?
अमानिशा के बाद तुझे
फिर से मेरी याद सताए...
मेरी अंधियारी रातों को
फिर से तू चमकाए!!


