Wednesday, October 26, 2011

Entropy-ism



We meditate...to seize the mind from outwards....although it is against the natural flow, against the entropy...yet we do..!!

सरिता का सागर में मिलना,
कलियों का फूल में खिलना,
और ओस की नन्ही बूंदों का
पत्तियों से लुढ़कना-फिसलना,

अविराम है, अगणित भी
स्वतः स्फूर्त है, स्वतः शील भी
प्रायोजित है, नियोजित भी.
कितना संभव है संभलना?

नियति के निश्चित-अनिश्चित पे
कैसा विलाप और कैसा मंथन?
आखिर इस (अ)सीमित मन का
बंधन प्रेम है या कि प्रेम बंधन?

Picture Courtesy: kealwallpapers.com

Sunday, October 23, 2011

है निशा अब जाने को


है निशा अब जाने को,
क्षितिज पर आभा बिखर रही,
कंचन किरणों से कली-कली
पुष्पित होती औ' निखर रही.

वंदन चंदन अभिनंदन की
बेला सुमधुर सुर-साज भरी,
अरुणाभ अमित उज्ज्वलता से
पल्लव होती, हो प्रखर रही.

अनुराग निहित स्पंदन सा 
शीतल सरिता का सलिल लगे,
निर्बाध प्रवाह की अभिलाषा
अंतर नित प्रेरित कर रही.

है निशा अब जाने को,
क्षितिज पर आभा बिखर रही.

Picture Courtesy: Sachit
Place: Lonar Crater, Lonar, India

Sunday, October 2, 2011

क्या खोया? और क्या पाया है!



मैंने जितना
पाके खोया,
उससे ज़्यादा
खोके पाया.

और अब सोचता,
इस अतीत में,
कितना खोया!
कितना पाया!

क्या समृद्धि
पाना ही है?
या फिर वृद्धि
खोना भी है!

ये भी जानना
ज़रूरी है कितना!
कि क्या खोया है,
क्या पाया है !!  


Picture: River Manas, India-Bhutan border (Courtsey: Amit Raj Singh)